सूरज सिंह मेमोरियल महाविद्यालय में उल्लासपूर्वक मनाया गया करमा मिलन समारोह
प्रकृति, विज्ञान और लोकसंस्कृति के समन्वय का संदेश; नागपुरी एवं कुड़ुख गीत-नृत्य ने बांधा समां
रांची, 29 सितंबर 2026। सूरज सिंह मेमोरियल महाविद्यालय, रांची के प्रांगण में मंगलवार को विद्यार्थियों द्वारा करमा मिलन समारोह का भव्य एवं गरिमामय आयोजन किया गया। झारखंड की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक परंपरा, प्रकृति के प्रति आस्था, सामुदायिक एकता और भाषायी विविधता से सजे इस समारोह में करमा पर्व की मूल भावना को आधुनिक संदर्भों से जोड़ने का प्रयास किया गया। समारोह का विशेष आकर्षण विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत नागपुरी एवं कुड़ुख लोकगीत और लोकनृत्य रहे, जिसने पूरे महाविद्यालय परिसर को लोक-संस्कृति के रंग में रंग दिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. त्रिवेणी साहू, पूर्व कुलपति, मुक्त विश्वविद्यालय, रांची, विशिष्ट अतिथि डॉ. सुदेश साहू, डीएसडब्ल्यू, रांची विश्वविद्यालय, रांची तथा कथा-वाचक डॉ. वृंदावन महतो, पूर्व अध्यक्ष, कुड़माली, मारवाड़ी महाविद्यालय, रांची का महाविद्यालय परिवार की ओर से प्राचार्य डॉ. बी. पी. वर्मा ने आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया। स्वागत के क्रम में प्राचार्य ने अतिथियों को झारखंड की सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप सम्मान प्रदान करते हुए कहा कि महाविद्यालय के लिए यह गौरव का अवसर है कि करमा जैसे महत्वपूर्ण लोकपर्व के माध्यम से विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति, प्रकृति और सामाजिक जीवन के मूल्यों को समझने का अवसर मिल रहा है।
प्राचार्य डॉ. बी. पी. वर्मा ने कहा कि करमा पर्व केवल पूजा और उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि यह मनुष्य और प्रकृति के बीच स्थापित उस गहरे संबंध की अभिव्यक्ति है, जिसने सदियों से झारखंड के सामाजिक जीवन को दिशा दी है। करम वृक्ष के प्रति श्रद्धा वस्तुतः प्रकृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना है। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति को केवल संसाधन के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे जीवनदाता और जीवन-सहचर के रूप में स्वीकार किया।
उन्होंने करमा पर्व के संदेश को विज्ञान से जोड़ते हुए कहा कि आज आधुनिक विज्ञान भी इस बात को प्रमाणित करता है कि मानव जीवन का अस्तित्व जल, जंगल, जमीन, वायु, मिट्टी, जैव-विविधता और प्राकृतिक पारिस्थितिकी के संतुलन पर निर्भर है। यदि जंगल कम होंगे, तो वर्षा और जलचक्र प्रभावित होगा; यदि मिट्टी की उर्वरता और जैव-विविधता नष्ट होगी, तो खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी; और यदि वायु एवं जल प्रदूषित होंगे, तो इसका सीधा प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ेगा। ऐसे समय में करमा पर्व की प्रकृति-केंद्रित जीवन-दृष्टि हमें आधुनिक वैज्ञानिक चेतना के साथ पर्यावरण संरक्षण का रास्ता दिखाती है।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि करमा पर्व को केवल एक दिन का उत्सव न बनाएं, बल्कि इसके संदेश को अपने दैनिक जीवन में उतारें। पेड़ लगाना, जल बचाना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना, प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना और जैव-विविधता की रक्षा करना भी करमा पर्व की भावना को जीवित रखने का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि विज्ञान हमें प्रकृति के नियमों को समझने की दृष्टि देता है और हमारी लोकपरंपराएं हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील होना सिखाती हैं। इन दोनों का समन्वय ही टिकाऊ और संतुलित भविष्य का आधार बन सकता है।
प्राचार्य ने विद्यार्थियों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए कहा कि लोकभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज की स्मृति, इतिहास, संवेदना और पहचान की वाहक होती है। इसलिए नागपुरी, कुड़ुख और अन्य स्थानीय भाषाओं के गीत-संगीत एवं लोकपरंपराओं को विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर मंच मिलना आवश्यक है।
करमा पर्व प्रकृति और सामुदायिक जीवन का पर्व : डॉ. त्रिवेणी साहू
मुख्य अतिथि डॉ. त्रिवेणी साहू ने करमा पर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि करमा झारखंड की लोकचेतना से गहराई से जुड़ा हुआ पर्व है। इसमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के साथ-साथ परिवार, समाज और समुदाय के बीच सहयोग एवं भाईचारे की भावना निहित है। उन्होंने कहा कि लोकपर्वों की सार्थकता तभी है, जब नई पीढ़ी उनके मूल संदेश को समझे और उसे अपने जीवन में आगे बढ़ाए।
उन्होंने विद्यार्थियों से अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का आह्वान करते हुए कहा कि आधुनिक शिक्षा और तकनीकी विकास के साथ अपनी लोकभाषा, लोकगीत, लोकनृत्य और परंपराओं को जीवित रखना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी आधुनिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक स्मृति और विरासत से भी होती है।
लोकभाषा में सुरक्षित है सांस्कृतिक आत्मा : डॉ. सुदेश साहू
विशिष्ट अतिथि डॉ. सुदेश साहू ने कहा कि करमा पर्व समाज को जोड़ने वाला लोकपर्व है। इसके माध्यम से प्रकृति, परिवार और समुदाय के बीच संबंध मजबूत होते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत नागपुरी एवं कुड़ुख गीतों की विशेष सराहना की।
उन्होंने कहा कि लोकभाषाओं में किसी समाज की सांस्कृतिक आत्मा सुरक्षित रहती है। जब युवा अपनी भाषा में गीत गाते हैं, लोकनृत्य करते हैं और अपनी परंपराओं को मंच पर प्रस्तुत करते हैं, तो वे केवल मनोरंजन नहीं कर रहे होते, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का काम कर रहे होते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को अपनी भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण के साथ आधुनिक शिक्षा में भी निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
लोकपर्व समाज की सामूहिक स्मृति के वाहक : डॉ. वृंदावन महतो
कथा-वाचक डॉ. वृंदावन महतो ने करमा पर्व की लोककथा, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि लोकपर्व केवल उत्सव नहीं होते, बल्कि इनके भीतर समाज का जीवन-दर्शन, प्रकृति-बोध, सामाजिक संबंध और सामूहिक स्मृतियां सुरक्षित रहती हैं।
उन्होंने करमा परंपरा में प्रकृति और मानव के संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि झारखंड की लोकसंस्कृति में प्रकृति के प्रति सम्मान जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। करमा पर्व इसी चेतना को गीत, नृत्य और सामूहिक अनुष्ठान के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे लोकपरंपराओं को केवल देखकर या मनाकर न छोड़ें, बल्कि उनके अर्थ और जीवन-मूल्यों को भी समझें।
करमा हमें प्रकृति और समाज से जोड़ता है : नकुल तिर्की
समारोह में वार्ड पार्षद नकुल तिर्की ने विद्यार्थियों को आशीर्वचन देते हुए कहा कि करमा पर्व हमें प्रकृति के प्रति सम्मान, समाज के प्रति जिम्मेदारी और एक-दूसरे के प्रति सहयोग की भावना सिखाता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है, तब युवाओं को पर्यावरण संरक्षण के प्रति विशेष रूप से जागरूक होना चाहिए।
उन्होंने विद्यार्थियों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए कहा कि अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान ही अपनी पहचान को मजबूत करने का आधार है। उन्होंने सभी विद्यार्थियों को उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं।
युवा पीढ़ी संस्कृति की मजबूत कड़ी बने : अजीत कच्छप
वार्ड पार्षद अजीत कच्छप ने विद्यार्थियों को आशीर्वचन एवं शुभकामनाएं देते हुए कहा कि करमा जैसे आयोजन युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि आज के विद्यार्थी कल के समाज का नेतृत्व करेंगे, इसलिए उनमें शिक्षा के साथ अपनी संस्कृति, प्रकृति और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति संवेदनशीलता का विकास आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि करमा पर्व का संदेश केवल परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें सामूहिकता, सद्भाव, प्रकृति-सम्मान और जिम्मेदार जीवन की प्रेरणा देता है। उन्होंने महाविद्यालय द्वारा विद्यार्थियों को लोकसंस्कृति से जोड़ने के प्रयास की सराहना की।
नागपुरी और कुड़ुख गीत-नृत्य रहे समारोह का मुख्य आकर्षण
समारोह का सबसे जीवंत और आकर्षक पक्ष विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत नागपुरी एवं कुड़ुख लोकगीत और लोकनृत्य रहे। पारंपरिक वेशभूषा में सजे विद्यार्थियों ने नागपुरी गीतों की मनोहारी प्रस्तुति से दर्शकों का मन मोह लिया। गीतों की लय, पारंपरिक नृत्य की गतियों और सामूहिक प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया।
इसके बाद विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत कुड़ुख गीत एवं लोकनृत्य ने समारोह में आदिवासी सांस्कृतिक विरासत की विशिष्ट छटा बिखेरी। कुड़ुख भाषा की मधुरता, पारंपरिक धुन और नृत्य की सामूहिकता ने उपस्थित लोगों को आकर्षित किया। विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों में अपनी मातृभाषा और संस्कृति के प्रति गर्व एवं आत्मीयता स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
करमा गीतों की सामूहिक प्रस्तुति और लोकनृत्य के दौरान पूरा परिसर उल्लास से भर उठा। विद्यार्थियों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से यह संदेश दिया कि प्रकृति की रक्षा, लोकभाषाओं का संरक्षण और सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
पूर्व प्राचार्य डॉ. बंदना राय ने की विद्यार्थियों की सराहना
समारोह में पूर्व प्राचार्य डॉ. बंदना राय की गरिमामयी उपस्थिति रही। उन्होंने विद्यार्थियों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम की सीमाओं से बाहर निकलकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने का अवसर देते हैं। उन्होंने कहा कि लोकभाषा, लोकगीत और लोकनृत्य किसी भी समाज की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर हैं और इन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है।
उन्होंने विद्यार्थियों को अपनी संस्कृति के प्रति गौरव की भावना बनाए रखने तथा शिक्षा के साथ सामाजिक एवं सांस्कृतिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए प्रेरित किया।
समारोह में उपस्थित शिक्षकों एवं अतिथियों ने विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों की सराहना की। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों में अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति गौरव, लोकभाषाओं के प्रति सम्मान तथा प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को और मजबूत किया। करमा मिलन समारोह ने यह संदेश भी दिया कि लोकपरंपरा और आधुनिक विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन को समझने के दो महत्वपूर्ण दृष्टिकोण हैं।
कार्यक्रम का समापन करमा पर्व की मंगलकामनाओं के साथ हुआ। इस अवसर पर प्रकृति संरक्षण, जल-जंगल-जमीन की रक्षा, लोकभाषाओं के संवर्धन तथा झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सामूहिक संदेश दिया गया।
समारोह में इनकी रही गरिमामयी उपस्थिति
समारोह में डॉ. बी. पी. वर्मा, डॉ. त्रिवेणी साहू, डॉ. सुदेश साहू, डॉ. वृंदावन महतो, डॉ. बंदना राय, वार्ड पार्षद नकुल तिर्की, वार्ड पार्षद अजीत कच्छप, डॉ. बिनय प्रकाश अखौरी, डॉ. अनिल बीरेन्द्र कुल्लू, डॉ. आर. एन. सिंह, डॉ. रंजित चौधरी, डॉ. अनुपमा, डॉ. सावित्री कुमारी, डॉ. अनीता कुमारी, डॉ. संजय कुमार षाड़ंगी, डॉ. त्रिभुवन कुमार साही, डॉ. सुबास साहू, डॉ. अभिषेक गुप्ता, डॉ. ऊषा कीड़ो, डॉ. मुकेश उरांव, डॉ. प्रांजल साह, डॉ. राजश्री इंदवार, डॉ. लक्ष्मी कुमारी, प्रो. राजेश कुजूर, शिबली अख्तर, अजय कुमार, रोनित केरकेट्टा, जितेंद्र सिंह, जावेद, विजय लुगुन सहित महाविद्यालय के शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष आशुतोष द्विवेदी की भी समारोह में गरिमामयी उपस्थिति रही।
